क्यों ना करें घर से काम

आज जब दुनिया कोरोना वायरस से पैदा हुई महामारी से जूझ रही है, इंटरनेट पर कहानियां छायी हुई हैं कि कैसे घर से काम करना (वर्क फ्राॅम होम) काम की उस परिभाषा को ही बदल रहा है जिसे हम अब तक जानते रहे हैं। सरकारों ने इस वायरस से लड़ने का जो एकमात्र उपाय निकाला, वह था – तालाबंदी (लाॅक डाउन) और लोगों को अलग-थलग रखना। बगैर किसी योजना के और बेतरतीब ढंग से लागू की गई तालाबंदी ने पूरी दुनिया में कार्यरत लोगों को गरीबी और भूखमरी की गिरफ्त में ढकेल दिया। इस बीच मालिकों/नियोक्ताओं ने इस संकट में अवसर तलाशने शुरू कर दिए।

उनके लिए घर से काम करवाना सबसे मुफीद तरीका साबित हुआ। आज तब तालाबंदी के छह महीने गुजर गए हैं, सोशल मीडिया के मंचों पर लोगों की थकान, चिंता और बिना काम मिए जिंदगी न जी पाने के तिरस्कार भरे अहसास की आपबीती फैली हुई है। अब चिकित्साकर्मियों से लेकर अकादमिक लोगों तक और यहां तक कि माइक्रोसाॅफ्ट जैसी कंपनियां तक यह बात कही जा रही है जिसे मजदूर संगठने लंबे समय से कहते रहे हैं कि ‘‘हम थकान से चूर-चूर होकर भी श्रम करते जा रहे हैं और हममें यह अहसास गहरा गया है कि हम अलगाव में ढकेल दिए जा रहे हैं’’। कार्यरत लोग मानने लगे हैं कि अपने अधिकारों के लिए मोल-तोल करने की उनकी क्षमता को बड़ा धक्का लगा है और घर से काम करवाने के नाम पर उनके मालिक अपना मुनाफा बढ़ाना चाहते हैं। अब मालिक/नियोक्ता घर से काम करवाने के दस्तूर से इतना प्यार करने लगे हैं कि वे टेक्नाॅलोजी कंपनियां जो पहले डाटा सुरक्षा को लेहर हमेशा चिंतित रहती थीं और अपने कर्मचारियों को दफ्तरों के परिसरों में मोबाईल फोन या पेन-ड्राइव लेकर आने की इजाजत तक नहीं देती थीं, वे आज कर्मचारियों को स्थायी तौर पर घर से ही काम करने का विकल्प चुनने को कह रही हैं। माइक्रोसाॅफ्ट, ट्विटर और अमेजॅन – सभी ने अपने कर्मचारियों के लिए स्थायी तौर पर घर से काम करने या दूरस्थ कार्य के विकल्प खोल दिए हैं।

कंपनियां क्यों हमसे घर से ही काम करवाना चाहती हैं?

मालिक एक ही उद्देश्य से निर्देशित होते हैं और वह है – अपने मुनाफे को ऊंचाई पर ले जाना। कोई भी कच्चा हिसाब बताता है कि हमारा घर से काम करना उनके आर्थिक हित में है। मान लीजिए कि एक आदर्श स्थिति में एक महिला नोयडा स्थित अपने घर से हर दिन आठ घंटे काम करती हैं। वह एक लैपटाॅप, एक मोबाईल फोन, अपने कमरे में एक ट्यूबलाइट और एक पंखा का इस्तेमाल करती हैं। उन्हें घर से काम करने के लिए एक मजबूत ब्राॅडबैंड इंटरनेट कनेक्शन की भी जरूरत है। नोयडा में प्रति यूनिट बिजली का खर्च आठ रुपए है (अगर वह दफ्तर से काम करती, तो व्यावसायिक दर पर यह खर्च मालिक/नियोक्ता को चुकाना पड़ता)। अब इस महिला द्वारा घर से काम करने के लिए उठाए जा रहे न्यूनतम खर्च का हिसाब कीजिए:

अब इस खर्च में एक अच्छे इंटरनेट कनेक्शन के लिए प्रतिमाह आने वाले 800 रुपये के खर्च को जोड़ दीजिए। इस हिसाब के मुताबिक जब वह महिला घर से काम करती है, तब सीधे-सीधे कंपनी उस पर 1,183 रुपये का खर्च थोप देती हैं अगर इस कंपनी में10 कर्मचारी हैं, तो यह कंपनी बिजली का उपयोग के वास्ते अपने इन कर्मचारियों पर 1.5 लाख रुपये का बोझ डाल देती है। इन सभी खर्चों में दफ्तर के मकान का किराया और उसके रख-रखाव के खर्चे तो शामिल ही नहीं हैं। इस तरह मालिकों/नियोक्ताओं के लिए हमसे घर से काम करवाना पूरी तरह फायदेमंद है।

क्या सचमुच काम के घंटों में लचीलापन है?

हम वक्त की बचत कर रहे हैं, मगर हकीकत यह है कि हम इस अतिरिक्त समय को काम में ही लगा रहे होते हैं। निजी नेटवर्किंग सर्विस वीपीएन द्वारा इंटरनेट परिगमन पर किया गया अध्ययन बताता है कि तालाबंदी के दौरान हम सबने ‘अपनी इच्छा’ के बिना किसी भुगतान के कम-से-कम दो घंटे अतिरिक्त काम किए हैं। जिस तरह हम घर से काम करने को उत्पादक महसूस कर रहे हैं, दरअसल वह मनोवैज्ञानिक दवाब बनाता है और मालिक/नियोक्ता हमारे इस ‘उत्पादकता’ के भ्रम को इस्तेमाल करते हुए हमारे ऊपर और ज्यादा काम थोप रहे हैं। और, हम हैं जिन्हें अस्वाभाविक तौर पर ज्यादा से ज्यादा घंटों तक खटवाकर लचीलेपन का शर्बत पीने के लिए लालायित किया जाता है। 64 प्रतिशत से ज्यादा हिंदुस्तानी महसूस करते हैं कि वे छुट्टियों से वंचित हैं। 94 प्रतिशत हिंदुस्तानी दफ्तर के काम का ई-मेल तब भी देखते हैं, जब वे कहीं घूमने जाते हैं। ये आंकड़े दुनिया में सबसे ज्यादा हैं और हमसे पीछे फ्रांस (93 प्रतिशत), थाइलैंड (92 प्रतिशत), मलेशिया (91 प्रतिशत) और मेक्सिको (91 प्रतिशत) है। दुनिया में हिंदुसतान न सिर्फ सबसे ऊपर है जहां 31 प्रतिशत रोजगार प्रापत लोग काम के दबाव के कारण छुट्टी पर नहीं जा पाते, बल्कि वे अपनी कंपनियों के सभी अहम फैसलों की प्रक्रियाओं में मौजूद रहने के दबाव को महसूस करते हुए अपनी छुट्टियों को भी रद्द कर देते हैं। नियोक्ता/मालिक हड्डी तोड़ मेहनत को इतना तवज्जो देते हैं कि जापानी कामकारों ने इसके लिए ‘कारोशी’ शब्द का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है जिसका अर्थ होता है – अतिश्रम से होने वाली मौत। हालांकि घर से काम करने का दस्तूर हमें यह यकीन दिलाने का भ्रम रचता है कि हम ऐसा करते हुए घर के काम (जैसे बच्चे-बच्चियों या बूढ़े माता-पिताओं या बीमार साथी को देखभाल) को पूरा कर सकते हैं, मगर हकीकत में ऐसा नहीं हेाता। यह काम के बोझ को और ज्यादा बढ़ाता है, खासकर महिलाओं के मामले में जहां वे दफ्तर के काम के साथ-साथ परिवार में देखभाल तथा अन्य सेवाकर्म के भार से भी दबी महसूस करती हैं।

जिसे हम वक्त का लचीलापन कहते हैं, वह अपने साथ बहुत सारी मांगों को लेकर आता है, जैसे हमें हर वक्त हाजिर होना होता है, किसी डाॅक्टर की क्लिनिक का फोन भी उठाना पड़ता है या खाना बनाते वक्त सहकर्मियों के साथ वीडियो मीटिंग में भी शामिल होना पड़ता है क्योंकि यह सब तो छोटे काम जो हैं। इसका मतलब यह है कि हम कभी भी अपने काम से जुदा नहीं होते, यहां तक कि जब हम शौच जाने को होते हैं। हममें से अधिकतर के लिए हर दिन आठ घंटे का काम एक दूर का सपना ही बना रहता है। आठ घंटे काम के अधिकार का जो भी कुछ स्वरूप आज बचा हुआ है, मालिक/नियोक्ता हमसे घर से काम करवाकर उसे भी छीन रहे हैं।

यह सिर्फ काम के घंटे भर नहीं हैं, जिसके पीछे मालिक/नियोक्ता पड़े हुए हैं। वे हमारे वैतनिक अवकाश के हक को भी हड़प रहे हैं। पहले अगर हम घर से काम नहीं कर रहे होते या बीमार होते, तब हम बीमारी का अवकाश ले सकते थे या अगर हमें किसी पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने जैसी निजी तौर की व्यस्तता होती, तब हम आकस्मिक या अर्जित अवकाश ले सकते थे और मालिक/नियोक्ता को वेतन देना ही होता था। हम जैसे कामगार लोगों ने लंबे समय तक संघर्ष कर यह अधिकार हासिल किया था। आज घर से काम करने का जो माहौल बना है, वहां हम अपने बच्चे का जन्मदिन मनाते वक्त भी मालिक/नियोक्ता या उसके कारिंदों का फोन उठाने या सोने के वक्त भी अपने शरीर का तापमान मापने को विवश हैं क्योंकि हमारे लिए किसी भी तरह की छुट्टी लेना एक लांछन ही है। हमारा मूल्यांकन साहब और सहकर्मी – दोेनों करते हैं। हमें यह महसूस कराया जाता है कि हम समुचित योगदान नहीं दे रहे हैं; हम अपने समय का ‘प्रबंधन’ ठीक से नहीं कर सकते या बगैर निरीक्षण व निगरानी के हम उपयोगी और लाभकारी नहीं हो सकते। दरअसल बगैर छुट्टी लिए उपयोगी और लाभकारी होने का दवाब हमारे वैतनिक अवकाश के अधिकार पर नियोक्ताओं/मालिकों की एक खामोश जीत है। हम घर से काम करने के इस दस्तूर को बरकरार रख खुद ही अपने अधिकारों को गंवा रहे हैं।

मालिक द्वारा हमें अलग-थलग करने के मायने

हमें घर के दायरे में रखकर मालिक हमें अलग-थलग करने में कामयाब होते हैं। इसका सीधा असर उनके खिलाफ हमारी संगठनबद्धता की क्षमतार पर पड़ता है। आमद गंवाने से भी ज्यादा अगर कोई चीज है जिससे मालिक नफरत करता है, तो वह है – हमारी संगठनबद्धता/संघबद्ध होने की स्वतंत्रता का अधिकार। हमें घर से काम करवा कर उन सामाजिक अंतःक्रियाओं से दूर रखा जाता है, जिन्हें हम कार्यस्थल पर अपने सहकर्मियों के साथ जीते हैं। साॅफ्टवेयर से आदेश प्राप्त करना और स्क्रीन को निहारते रहना हमें मानवीय स्पर्श से अलग-थलग करता है और इस तरह हमारा एक-दूसरे से कटा-घंटा रहना मालिकों के हितों ही हिफाजत करता है। मालिक चाहते ही हैं कि हम एक-दूसरे से न तो बातें कर सकें और न ही सूचनाओं को साझा कर सकें। क्या आपने कभी सुना है कि एक ‘पेशेवर’ कभी भी दूसरे को अपने वेतन के बारे में नहीं बताता? यह एक तरीका है जिसके जरिए कंपनी का प्रबंधन वेतन असमानता को बनाए रखता है। जब दो व्यक्ति एक ही तरह का काम कर रहे होते हैं और एक समान समय-अवधि में ही काम को पूरा कर रहे होते हैं, मगर उन्हें एक-दूसरे से बातें करने और वेतन की मात्राओं के बारे में सूचनाओं को साझा करने के मौके नहीं मिलते, तब आशंकाएं इन दोनों को एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा करने और उनकी जायज मेहनताना को हड़पने की ही होती है। प्रबंधन के साथ यूनियन/संगठन द्वारा मोल-तोलकर तय किया गया मेहनताना (पारदर्शी और सबके लिए लागू होने वाला) हमेशा ही व्यक्तिगत तौर पर किए गए अनुबंधों से बेहतर होता है। कौशल व दक्षता आधारित क्षेत्र के अनुबंधकारी कर्मचारियों या कामगारों (गिग-वर्कर्स) के मामले में यह बात साफ तौर पर समझी जा सकती है।

उदाहरण के लिए, उबर कर्मचारियों के मामले को समझिए। एक ही तरह के परिवहन व परिगमन के लिए दो चालकों को अलग-अलग तरह की दर से मेहनताना मिल सकता है, लेकिन ये दोेनों चालक कभी भी इस असमानता को जान नहीं सकते क्योंकि ऐप्प का फलक उन्हें एक-दूसरे से संवाद करने ही नहीं देता। यहां तक कि अगर कोई कर्मचारी कोई शिकायत जाहिर करता है, तो उसे आसानी से नजरअंदाज कर दबा दिया जा सकता है क्योंमि समूह की आवाज को दबाने के मुकाबले व्यक्ति की आवाज को दबाना ज्यादा आसान होता है। इस तरह के अलगाव से मालिकों/नियोक्ताओं के हित सघते हैं। दूसरी तरफ अगर कर्मचारी अथवा कामगार एकजुट हो जाते हैं, तब तस्वीर बदल जाती है। याद कीजिए कि कैसे ‘डोर-डैश’ और ‘डिलिवरों’ (भारत के ‘डॅन्जो’ और ‘स्विगि’ की तरह) जैसी कंपनियों से जुड़े आयरलैंड और नीदरलैंड के कर्मचारी एकजुट हुए और उन्होंने प्रबंधन से साथ डिलिवरी मेहनताना तथा अतिरिक्त कार्य के लिए विशेष दर पर भुगतान के लिए मोल-तोल किया और दिखाया कि कैसे यूनियन की सामूहिक कार्रवाई हर किसी के लिए वाजिब मेहनताना की गारंटी कर सकती है।

स्वास्थ्य और सुरक्षा की अहमियत

जब हम कार्यस्थल पर होते हैं, तब हमारे स्वास्थ्य और सुरक्षा की जिम्मेवारी नियोक्ताओं/मालिकों पर आती है। पेशागत/व्यवसायगत सुरक्षा और स्वास्थ्य नियमावली के कारण कंपनियों पर खर्च आता है। नियोक्ताअेां को कार्यस्थल पर समुचित रोशनी, हवा के आवागमन व प्रसार, आग से सुरक्षा, आदि की गारंटी करनी होती है। कल्पना कीजिए कि जब आप घर से काम कर रहे होते हैं, तब अगर शाॅर्ट-सर्किट हो जाए और आपका कंप्यूटर/फोन ठप्प पड़ जाए, तो कौन इस अगलगी और उससे होने वाले नुकसान का जिम्मेवार होगा? आप ही तो हाेंगे। अगर यही दुर्घटना कार्यस्थल पर हो, तो इसकी जिम्मेवारी नियोक्ता की होगी और अगर आप इस दुर्घटना में जख्मी होते हैं, तब आप क्षति-पूर्ति के लिए मुआवजे के हकदार होंगे। लंबे समय से नियोक्ता इन जिम्मेवारियों से पल्ला झाड़ लेने की कोशिशों में लगे हैं और अपने हित में श्रम कानूनों में संशोधनों के लिए जी-तोड़ तिकड़म में लगे हैं ताकि वे उन लोगों की सुरक्षा और सकुशलता की जिम्मेवारियों से मुक्त हो जायें जिनसे वे काम लेते हैं। मालिक हमसे दूरस्थ स्थल से काम कराकर आसानी से अपने इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं। जब आप घर से काम कर रहे होते हैं, तब आपकी सेहत और सुरक्षा की पूरी जिम्मेवारी आपके ऊपर ही होती है।

आने-जाने में होने वाली वक्त की बर्बादी से बचने का तर्क

यह तर्क दिया जाता है कि घर से काम करने के कारण उस वक्त की बचत हो जाती है जिसे हम कार्यस्थल पर जाने और वहां से लौटने में बबार्द करते हैं। इस तर्क पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है। हमें उन वजहों को समझना होगा कि आखिर क्यों हम जाने-आने में घंटों बर्बाद करने और भारी खर्च उठाने के लिए बाध्य होते हैं? ऐसा इसलिए होता है कि हमारे लिए कार्यस्थलों के आसपास अच्छा-खासा आवास लेना असंभव होता है। मकान किराया पर नियंत्रण के अभाव और जन-आवासीय व्यवस्था की गैर-मौजूदगी तथा साथ-साथ महंगाई की दर से उदासीन हमारे छोटे व तंग वेतन हमें कार्यस्थल के नजदीक अच्छे-खासे घर लेने के काबिल ही नहीं रहने देते। जनपरिवहन की कमी लंबे आवागमन की एक दूसरी वजह है जिससे हमारे आवागमन के साथ खर्च और सुरक्षा भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
हम अपने पुराने कार्यस्थलों पर जाने से भी खौफजदा हैं क्योंकि यह हमें वहां की अपमानजनक कार्य-संस्कृति, आवागमन की कठोर मशक्कत ओर हममें से अनेकों के लिए हकमारी की घटनाओं की याद दिलाता है। हमें याद है कि नियोक्ताओं/मालिकों ने हमें वैतनिक अवकाश नहीं दिया, हर दिन आठ घंटों से भी ज्यादा काम करवाया और हमारे वाजिब मेहनताना को हड़प लिया। हम उस पुरानी दमघोंटू ‘सामान्यता’ के माहौल में फिर से लौट नहीं सकते। इस महामारी ने हमें यह मौका दिया है कि हम बेहतरी के लिए मौजूदा कार्य-संस्कृति की तमाम गड़बड़ियों को बदल दें। घर से काम करने के दस्तूर को स्वीकार कर हमें इस मौके को गंवाना नहीं चाहिए। अभी घर से काम करना एक विकल्प है, आने वाले समय में यह दस्तूर न बन जाए, इसलिए अभी भी वक्त है कि हम इसके खिलाफ लड़ें।

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